Wednesday, 29 April 2015

दिव्य धेनुमानस

चौपाई - बसहिं सुरभि जहाँ तीरथ सोई। तजहिं प्रान मुक्ति सब कोई।। रोम - रोम सुर तीरथ चरना। केहि बिधि मातु करउँ मैं बरना।।  अर्थ - जहाँ सुरभि गौ माता बसती है वहीं तीरथ होता है। जो गौ के सन्मुख प्राण छोड़ता है, वह हर व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त करता है।(अन्तिम समय में जो राम नाम लेने का जो फल है वही गौ माता के स्पर्श का है। स्वयं विचार करे कि दोनों कार्य में कौन सा सरल है निश्चित ही गौ स्पर्श सरल है) जिस गौ माता के रोम - रोम में देवता हैं और पैरों में तीरथ है ( तीर्थ तो मेरे पैर के नीचे है) किस प्रकार माता मैं आपकी महिमा का वर्णन करूँ।                                              धेनु मानस

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