Monday, 4 December 2017

धेनुमानस ग्रन्थ

मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः |
वृद्धिमाकांक्षता नित्यं गवां कार्याः प्रदक्षिणाः ||
प्रथम सर्ग 
जिसका बालमुकुंदलीलाप्रसुनम् नाम है
वंदे गजास्यं विघ्नेशं वीणापाणिं सुबुद्धिदाम्
गौरीं श्रद्धामयीं चैव शिवं विश्वासरुरिणम् ||
सद्गुरुं शंकरं नौमी करुणावरुणालयम् |
गंगाधरं वृषारुढ़ं श्रद्धावनतमस्तकः ||
सत्यं नित्यं निर्विशेषं परेशं दैन्यभावाकर्तुं समर्थम् |
लाभं क्षेमं सेवकेभ्यो ददानं गौरीपुत्रं ज्ञानदं तं नमामि ||
   
हिमशालसुते गंगे मातस्त्रिपथगामिनि|
विष्णुपदि नमस्तुभ्यं भवदुःख निवारिणि ||
   
गावो ज्ञेयाः सेवनीयाश्च पूज्याः यज्ञधारा हव्यकव्येषु शस्ताः
गीर्वाणेभ्यः शक्तिदा  मानवेभ्यः सेवातुष्टा भुक्तिमुक्तिप्रदात्र्यः ||
   
दोहे....
विनयदेव विनती करुँ सुमति सुअवसर दीन्ह
गौरीनंदन गनपति सुफस मनोरथ कीन्ह ()
   
मोरे गुरु पितु संभु है भुवनेश्वरी निज मात
चरनकमल की बंदना कर राखो मम तात ()
   
एकबार सिव सहीत भवानी ...
हिमगिरी सिखर सुआसन जानी...
मुख प्रसन्न तन भूति रमाए... 
वाम अंग हर सिवा बिठाए....
   
ब्याल काल गल अरु मृगछाला...
सनमुख बिष हलाहल प्याला...
नंगी बंदि प्रदखिन कीन्हो...बरद हस्त अभय तेहि दीन्हो...
   
पूँछऊ तात बात कहूं सारी...कारन काह सोच भइ सारी...
कहेऊं नंदी सुन सोच विमोचन ...हे त्रिपुरारि मनोहर लोचन...
   
धेनु सहहिं दुख कोटी अपारा...ताको कोऊ नहिं देखनहारा...
जगत मात दुख होऊं बेहाला...कस कठिन देख कलिकाला...
   
आदि छंद गायत्री बखानी...गुपुत मंत्र रखि गुपत कहानी...
महिमा रहित दीन पसु जाना... तुरत दिए रिषि खोरी खजाना...
   
दोहा...
ममताई जो मात है असुर देखेऊं माँस...
धरा सुखी नहीं होवई निकसी जो दुख साँस...

   
सुनहुँ नाथ सेवक मैं तोरा...तुम्हहिं छाड़ि केहि करहुँ निहोरा.....
निज पीर बोलन यह आई...जगतबंद्य गौ सबकी माई...
   
कृपासिंधु सिव औढ़र दानी ...कहेऊं धेनु निज कथा बखानी....
हे वृषबाहन संभु पुरारी...कठिनलकाल गति की मैं मारी...
   
पारबती निज मल ते प्रगटी...देव समाज अग्र गनपति...
भुवन तीन को कहु अस प्रानी...पूजनीय मल बेद बखानी...
   
यदा कदा हरिहर अवतारही...बमदनीय मल तहँ नहिं कहहीं...
नीलकंठ प्रभु करहुँ बिचारुं..तदपि धेनु दुख सहहि अपारु...
   
दोहा...
सुर तैतीसों रोम बसि जो कर फेरे गात...
नेत्रजोति दिन दिन बढ़े अस्थि बज्र होई जात...
   
ईक दिन बिधि के भवन सिधाए...देव समाज सकल मिलि आए...
सुर समाज ईत ऊत बिलगाए...ईक होई अति अहं सताए...
   
कहु बिधि हमहिं एक आस्थानु...जहँ मिलि रहहिं होई सनमानू.....
सुनहुँ देव तब कहेऊँ बिधाता..सकल निवास एक गौमाता...
   
रोम रोम करि बैठे थाना...धन्य धेनु सब कगगि बखाना...
रमा गंग दोऊ होई विलंबू...करई बिचार कहां अवलंबू...
   
ब्रह्मा कहेऊं जाऊं निज लोका...सपरसरि लच्छि होई अति सोका....
कृपा करहुँ कहूण देहु निवासू ...गंग गौंत श्री गोबक बासू...
   
दोहा...
सुर समूह एकऊ करि तब प्रताप गौमात...
तेहि कारन यहि जगत में करे असुर गौघात...
   
सुनत संभु भरि बारि बिलोचन...केहि बिधि होई सुरभि दुख मोचन...
प्रथम ऊपाय धेनु गुन गाना... गांव गांव पुर नगर बखाना...
   
सतजुग मुक्ति दृष्टि सब राखी...त्रेता धरम करम बहुभाखी...
द्वापर काम प्रबल अति बाढ़ी...कलिजुग अर्थ भाव रहि गाढ़ी...
   
धरम रुप सब धेनु बखानहीं...कलि के मानब नहिं सन्मानहीं....
अरथ काम आगे करि लिजो..धर्म मोच्छ पाछे करि दीन्हो...
   
पाद चार पावन नित चलहीं..परम चार पुरुषारथ लहही...
भूमंडल नित धेनु बखानी...धन्य धरा सुनि गौ गुन बानी...
   
दोहा...
एहि बिधि जे जे गुन बसे कामधेनु बपु मांहि...
लब्ध प्रतिष्ठा थापिकै सकल बस्तु मिलि जाहिं...
   
आसुतोष सिव धेनु बतावा...बृवाहन मोते प्रभु पावा...
नंदी बिनु कछु काज होई...बहन करे सब भार संजोई...
   
कृषक खेत हल बैल चलावा...सस्य स्यामला धरनी बनावा....
अन्न उपजि करि छुधा मिटावा...उर संतोष मुदित मन पावा...
   
जंत्र चालित जब भूमि बुआवा...मिलही तोष अन्न जे खावा....
बिग्यानी रिषि मुनि कहाहीं...श्रम बिनु साध्य जीविका नाहीं...
   
श्रम ते नीद भयउ जग माहीं...श्रम सरीर सम औषधि नाहीं....
निज हित हेतु कर्म जब होई...परहित होई परिश्रम सोई...
   
दोहा...
कर्म धर्म कर्तब्य जे कहिए तीन है एक...
परमारथ के साध ते उपजे बिमल बिबेक...
   
कहेऊ धेनु सृष्टी रचना..मेरो मल मलसोधक बरना....
मल नहिं गोबर रचेऊँ पुरारी...सुनहूँ कहहूँ नित मति अनुसारी
   
जेहि घर लेपन गोबर होई...अन्न धन छीजत नहिं कोई...
सुचिता निर्मलता तहाँ होई... सुर समुह गृह धावत सोई...
   
अनुमय बिकिरन मिटे प्रभाऊ...मच्छर दंस मेटत सब काऊ...
गोबर ऊपला धूप जलाई...दिब्य भाव भावित प्रभुताईययय
   
गोबर जैविक खाद बनावा...धरा उरबरी सकल सजावा....
फसल फीसली मनहिं मिटावा..गोबर दान संपदा पावा...
   
दोहा...
गोबर लेपन जो करे मेटत तन की पीर
दाद खाज सब रोग हरि नीरुज होऊ सरीर...
   
गोमय सरल सुभाऊ बनायो....दुख दारिद सब दूर भगायो
जाकी मल महिमा बखानी...बेद पुरान धन्य निज जानी
   
बेदमाता गायत्री कहहीं... धरमशास्त्र सन्मत सब लहहीं...
गायत्री गौ रुप बिग्यानी....त्रय सत त्रेता द्वापर जानी...
   
कलजुग बिलग गायत्री कीन्हा....बेदमाता सुभ रुर चीन्हा...
तीन कांड जग बेद बखाना...करम ग्यान भक्ति कर गाना...
   
पूजा कर्मकांड बिन धेनू...बांस बिना बाजहिं जस बेनू....
ग्यान जोग तप नेम अचारा...बिनु गोदूध होई निस्तारा....
   
दोहा....
भगति रुप नंदिनी जहां प्रगटे प्रेम अथाह...
बिना धेनु रस ना मिले कैसो करि अवगाह....
   
गायत्री गुर मंत्र सुदीजो... तत्सवितुः पद हियँ धरि लीजो...
सूरजकेतु नाड़ी ईक होई...गौके पृष्ठभाग बसि सोई...
   
पीत द्रब्य नित निकसे तासो...घृत अरु दुग्ध पीत भयो जासो...
सो नाड़ी गौपुच्छ सुसाजी...तरपई पितर बैकुंठ बिराजी...
   
आखर बहु अरथ उचारी...रच्छा चलहिं गौ गीत बिचारी...
कबच धेनु मानुष तन पायो...रच्छा को सब भार ऊठायो...
   
गति अरु सुमति सबहि यहि दीन्ही....संकट कटै पाप हरि लीन्ही...
गौ के दूध गीत नित गाए ...श्रीमदभगवद गीत सुनाए....
   
दोहा...
क्या नहिं दिया गाय ने को करि सकै बखान...
मानव की यह मीत है कह गएँ बेद पूरान...
   
पंचगव्य को जो करि पाना...पूजा हेतु प्रथम प्रमाना.....
गव्यपंच देवत्व दिलावहीं...पंचामृत प्रातिष्ठ करावहीं...
   *
बिप्र बिना नहिं सुरगन निष्ठा....बिना धेनु गृह कहाँ प्रतिष्ठा...
कन्यादान संग गौदानू...तब घर बसे नीति यह जानू...*
   *
बिप्र बिना नहिं सुरगन निष्ठा....बिना धेनु गृह कहाँ प्रतिष्ठा...
कन्यादान संग गौदानू...तब घर बसे नीति यह जानू...*
   
बैबाहिक बिधि गौमुख गंगा...प्रथम गोत्र द्विज पूछेऊं संगा...
सर्बोषधि गौमुत्र समाई...कहु का ब्याधि जो नाहिं नसाई...
   
दोहा....
धन्य धन्य भारत धरा प्रगटे जहँ गोपाल...
मात देबकी तजि गयो बने जशोदालाल....
   
एकबार द्वापर जुग माहीं....मिटे धरम सत्कर्म नसाहीं....
राजा कंस निठुर अभिमानी...मात पिता बंदीगृह आनी..
   
धरती व्याकुल कंपति भारी... धरि गोतनु मही फिरत बिचारी...
   
धरि धीरज निज नाथ पुकारी....सुर समुह मिली संग पुरारी....
   
नयन बारि हरि सनमुख होई...सुर समुह बरबस ईक होई..
गगन गिरा सुवि सुर सब हरषे...भयो ऊछाह सुमन तब बरषे....
   
मनुजरुप राखे सुर चोरी...तहँ अवतरेऊँ सेस हरि जोरी...
हरषित धरा सब जोही...कब आवें प्रभु दस दिक सोही...
   
दोहा....
ईहाँ मिले बसु देबकी मंगल होई बिबाह....
सुनि अकासबानी तब मिटेउ सकल उछाह....
   
सुनहु कंस जे भगिनी पिआरी...अष्टम गरभ भयउ असुरारी...
तिनके हाथ नास तब होऊ...सुनेऊ कंस रिस बस मति छोऊ....
   
खरग प्रहार चोहि अब मारु.....निज अनिष्ट को करहु संहारु....
नीति बचन सुभ कह बसुदेबा...भगिनी बध अनुचित अघ लेवा...
   
जनमत सुतन्ह तुम्हहि हम देऊ...बचव अन्यथा होई जेऊ....
गयउ कंस निज भवन बिसाला...आयऊँ वसुदेव सुर साला....
   
प्रथम रुदन सिसु मंगलकारी...अधम क्रूर नृप सनमुख डारी...
दया लागि सो बध नहिं कीन्हों...नारद कंस भवन सिख दीन्हो....
   
दोहा....
गेवरिषि मति फेरिकै, कंस बोलि बसुदेव...
पटकि सिला नवजातहूँ बाल घात सठ लेव...
   
सप्तम गरभ सेस अब आए....मातु देबकी छबि श्रुति गाए...
बाढ़े क्रूर पाप बड़ धारी...दंपती कारागार बिचारी....
   
कर्षन करि हरि थापि रोहिनी...नहिं जाने कोउँ माया मोहिनी...
रौहिनेय बनि जनमे दाऊ ...नंद भवन अति भयउ उछाऊ....
   
जब उच्छीह उत्सव धरि रुपा...नारायन रखि रुप अनूपा...
निरमल नीर नदी बह धारा...प्रगटे पाहन मनि उजियारा...
   
फूलहिं फलहीं बिपिन हरि आई...प्रकृति करहिं नित पति अगुवाई...
पाहन सरिता बिपिन सुहावन...परहित भाव मुदित मन भावन....
   
दोहा....
धेनु रंभावहिं संतजन अति आनंद उमंग...
प्रगटे जहँ तहँ देवगन निकसे ओम तरंग
   
सुंदर सुंदर काल तब आवा...परम रोहिनी नखत सुहावा
मंद मंद जल बरषन लागे...बरषे सुमन देवगन जागे
   
अष्टम तिथी सुभ भादों मासा...अरध राति सुचि भयऊँ प्रकासा...
देबकी सनमुख हरि एहीं भाँती...निसानाथ प्रगटेउं जिमि राती...
   
अद्भुत रुर लीन्ह भुज चारी...पंकज गदा शंख चक्र धारी...
बंधन खुले दरस भइ आजू...परीनीद नृप सकल समाजू...
   
सुतपा पृस्नि पूरब जनमू..यबस बसुदेव देबकी करमू...
पृस्निगर्भ नाम तहँ मोरा..अब गोपाल नाम चितचोरा...
   
दोहा...
मात .पिता के देखत बास बने भगवंत...
सकल द्वार आपुही खुले आए लेन अनंत...
   
प्रभुहि सीस धरि चलि बसुदेवा..जमुना चाह नाथ निज सेवा...
चरन परयि रबितनया सांति...श्री हरि सोह नागमनि कांति
   
ब्रह्म मुहुरत गोकुल गोबिंदा...अस्तुति करहिं सकल मुनिबृंदा...
जै जै गोबर्धन गो चारी...प्रात काल दरसन गौ प्यारी...
   
मनके सपन सिद्ध तिन्ह केरे...जे उठि धेनु दरस करि फेरे...
नंद नंदी सपनेहुँ हरि देखी...तुरत उठे गौधाम बिसेखी....
   
करि बंदन खुर रज सिर लीन्ही...पाँच बार प्रदखिन कीन्ही....
कपिला गौ निज कर्न हिलावहीं...सकल मनोरथ सुफल बतावहीं....
   
दोहा....
इहाँ सुनंदा दौरत आइ जसोदा पास...
बालरुप प्रभु देखत भइ पूरन आस...
   
गावरिं गीत सुनंदा आई...नंदभवन प्रगटेउण कन्हाई...
जसुमति धन्य धन्य मैं आजू...गोप गोपी नाचहिं बजि बाजू
   
समाचार ब्रजमंडल छायो...बृंद बृंद मिलि नृत्य रचायो...
ग्वाल बाल सब धेनु सजावहीं ...मंगल गीत सुमंगल गावहीं....
   
छंद.....
धन धन गोपाला हे नंदलाला गौ कारन जग आयो...
सुन हे बनवारी बिनय हमारी गौ को नहिं बिसरायो...
क्रमशः.....
   
धरिके नररुपा हे सुरभूपा गौ चारन बनमाली...
जेहि सृष्टि बनाई वही गौ माई दीन्हि सीख गौपाली...
   
का करुँ प्रसंसा मानस हंसा गोकुल तारन आयो...
तूँ अबिकारी जनमन हारि धनि धनि जो हियँ लायो....
   
नंद जसोदा दीन्हि बिनोदा तप केवस गौ सेवा...
यह दास तुम्हारो आन पधारो सरन गोपाल को लेवा...
   
नंदजी और यशोदाजी को आपने विनोद दिया...ऊनकी तपस्या गौसेवा है ..हे प्रभु आपका यह दास है आकर कृपा करो गोपाल को शरण ले लो....
   
दोहा...
बजी बधाई चहूँ दिसि उमगि उमगि आनंद....
क्या सोभा गोकुल कहुँ भागे सिव सानंद
   
चारो तरफ बधाईयाँ बजने लगी...आनंद उमड़ने लगा... गोकुल की शोभा का क्या वर्णन करें...स्वयं भगवान् शिव आनंद मे भागने लगे....
   
उहाँ पूतना कंस बोलावा...बाल घात को मंत्र बतावा...
तन सुंदर हिय विष धरि भारी...चलि पूतना रुप निखारी...
   
पूतना ने शरीर को सुंदर बनाया....एवं ह्रदय में विष रख दिया अपने रुप को निखार कर पूतना चली....
   
जहँ कोउ बालक देखि अबोधा...गरल पिवाइ बिठायो गोदा....
नंदालय तेहि कीन्ह प्रबेसा....खिंचत चलइ सब देखि सुबेसा...
   
जसुमति आज बधाइ लीजो....लालन को कछु छव मोही दीजो...
हिय लगाइ बिष पान करावा....नैन मूदि प्रभु सिवही मनावा....
   
सोचेऊँ हरि माखन अब खावे... जगत रिति इहाँ गरल पिलावें...
पिए प्रान प्रभु रोवन लागी...छटपटाई तेहि निज तन त्यागी...
   
दोहा....
भयो कठोर सब्द तब गोप गोपी सब आय....
जेहि केहि बिधि कान्हा लिए नारायन भे सहाय...
   
संपूर्ण औषधियाो का भंडार गौशाला हैं....ईसलिए श्रीकृष्ण को तुरंत गौशाला लाया गया..एवं गौमुत्र से सर्वप्रथम स्नान कराया गया
   
इंद्रिय दस नाभि अरु ग्रीवा....पाई सुद्धि इन्ह ते सब जीवा...
   
गौ की पीठ सीस धरि लाई.... मिटि विषाद तच्छन सुख पाई....
   
गौ की पूछ झारी तब लिन्हो...बड़ सुख पाइ प्रभु हंसि दीन्हो..
   
जिन्ह गौपुच्छ फेरि घुमायाो....कबहुँ ब्याधि तहँ निकट आयो....
   
इंद्रिय ह्रषीकेस हरि प्राना...ईस्वर कंठ विष्नु भुज ध्याना...
   
अज प्रभु पाद जानु मनिमाना...अच्युत कटि कर जग्य जंघाना...
   
अजन्मा भगवान् पैरों की मणिमान जानुओं की , अच्युत  कटि की यज्ञ भगवान् जंघाओ की रक्षा करे...
   
दोहा....
गौरज को तब तिलक हो दूर भयो अवसाद....
जे घर धेनु रंभावहिं ताको मिटे बिषाद....
   
ऊहाँ पूतना बड़ि भयकारी....धेनु परयि सोई नजर ऊतारी...
गाय धाय पय एक समाना...होई परीछन सब जग जाना
   
मानव मात्र मात दो होई...यहि कारन माधव माँ दोई...
जनम दियो देबकि जननी...धेनु जसोदा पालन करनी....
   
कोउ अस पुरुष जगत महँ नाहीं...जाकी दुइ जननी वहिं आहीं...
दूसरी जननी धेनु ही होई....करहुँ बिचार सुजन सब कोई....
   
इस दृष्टि कबहुँ जब होई नरतनु पावत रत हित सोई...
एक धरम इक नेम अचारा...करहुँ सदा गौ को सत्कारा....
   
दोहा....
धेनु जगत हित प्रकटेऊँ परम हितैषी जान....
कर पूजा इस मात की त्याग मोह मद मान....
   
बोलि धेनु अहि भूषन धारा...मम हित हेतु हरि अवतारा...
बाल सुलभ लीला प्रभु कीन्हो...धेनु जसोदा को सुख दीन्हो...
   
पूरब जनम द्रोन नंद होई....धरा जसोदा जानहुँ सोई....
गौसेवा को प्रतिफल पायो...सकल भुवनपति गोद खिलायो...
   
सबसो बड़ो पुन्य जग माँहीं...मन कर्म बचन धेनु परिछाँहीं....
धन्य धेनु कोउ तुम सम नाहीं....खुर रज मिलि सब तीर्थ नहाहीं...
   
बसहिं सुरभि जहाँ तीरथ सोई....तजहिं प्रान मुक्ति सब कोई....
रोम रोम सुर तीरथ चरना...केहि बिधि करउँ मैं बरना....
   
दोहा...
जे श्रद्धा संबल नहिं गैयन सों नहि नेह....
पूजा जप तप जग्य फल कबहुँ नाहिं तिस गेह....
   
घर गृहस्थ जानेउ इक याना....असुर समूह सतावत आना....
नीचे सकट छुलत रहि झूला....पलटी दीन्हि मधुसूदन सूला...
   
अध नहिं ऊपर राखे मोही...जीवन रथ चलावत वोही....
निसिचर एक तृनाबर्त आवा....गोरज महिमा गोकुल पावा...
   
नील सिला पर पटकेउ ताहीं...धन्य भइ गति ब्रज रज चाहीं...
   
असुर अधम तेहिं कंस पठीवही...गो रज पाइ मुक्त होइ जावही...
   
देखि देखि सुर हरषहिं लीला... कल्पबृच्छ के डारहिं फूला...
धन्य भूमि पाहन बन सरिता...चरन रेनु बेनु ध्वनि भरिता...
   
दोहा....
गोबिंद गोकुल आनिकै धनु धूरि लपटाइ....
सेस महेस सुरेस भी दृस्ट देखि अकुलाइ....
   
कृष्नकृपा किमि कहौं बखानी ....गरल पिलाइ मुकुति को दानी....
गरल घोलि जिन्ह घालि समाजू...नैन मूदि नहिं देखहिं आजू....
   
भगवान् कृष्ण की कृपा का क्या बखान करें....वे तो विष पिलाने वाले को मुक्ति का दान करते हैं....
   
क्योकी हम कसाई के पास जाकर गौरक्षा करने मे फीरलहाल समर्थ नही है...
परंतु वो तप वो बल हमारे पास सकता है जाप करने से ...
   
यहां यदी कहते है की जाप करीए...तो आप सबको अवश्य करने चाहिए... क्योकी ऊन जाप की संख्या को एकत्र करके
   
गौ गंगा गिरिराज बेहालू...आँख मूदि बैठे श्रद्धालु....
नैन उघारी गिरिराज देखिहउँ तीनहूँ....मातु भारती संस्कृति मूलहूँ....
   
करत पान पय बेद पुराना...धर्म शास्त्र को रच्यो बिधाना....
गंग तीर बैठे करि रचना...बसि पहार बोले सिद्ध बचना
   
गौ गंगा गिरि जग आधारु....नित बहि प्रानवायु बिस्तारु.....
जलवायु निर्मित यह देहि...ईनके मिटे बिस्व छय लेही....
   
दोहा.....
अनुचर जे श्रीकृष्ण के तिनको यह व्यवहार....
कृष्ण सदा ठाड़े रहे सरिता धेनु पहार...
   
नंदालय नित नव नव लीला....प्रभु हरि भार हरेउँ गुन सीला...
गोद बिठाइ पय पान करावे...होत विलंब मातु नहिं भावे...
   
पूजा हेतु भयउ अति देरी....यहि कारन सुत दिन्ही निवेरी....
निज मुख खोलि ब्रह्मांड दिखावे...रोम रोम सब देव बतावे....
   
जेहि घर गौसेवा नित होई....सुर तैंतीस कोटि बसि सोई....
सब मंदिर तीरथ तहँ आवे...चारधाम पुरी सात सुहावे....
   
पूजा कौन कहाँ तूँ जाई....गौ बंदन ते सब फल पाई....
गौ गोपाल करहिं जहँ बासू....सदा तहाँ सुर करहिं निवासू....
   
दोहा....
मातहि रुप दिखावहिं मंदिर कवन फिराइ....
सब मंदिर जेते बने सो समुझउँ गौमाई....
   
काम ते नाम भयउ संसारु....दिन दिन बढ़इ प्रभाव बिस्तारु...
रिषि तपसी माँगन नित आवहीं....दरक पाइ निज सुफल मनावहीं....
   
बसुदेव प्रेरित तब आयो....गरग मुनि सब दरसन पायो...
गौ महिमा गावत यह सारी.... गौसाला तब नाम उचारी.....
   
इनके नाम एक ते एका...गावहिं रिषि मुनि नाम अनेका...
गौसेवा रच्छा हित आनी...गरग नाम गोपाल बखानी....
   
इनसो बड़ो सेस महि आयो...संकर्षन बलराम कहायो...
एकहिं लच्छ गाय की रच्छा... हरि अवतरेऊँ धरा सुरछा...
   
दोहा...
धन्य यशोदा नंद हैं, जा घर आएँ स्याम....
धन्यभइ ब्रजभुमि जंह, अवतरे घनस्याम....
   
कर अरु पाद चार ते धावहूँ...गौ को गोठ प्रभुहि अति भावहूँ....
पूँछ पकरि अब होवत ठाड़ो....छन छन धेनु संग हरि बाढ़ो....
   
बत्स पिए पय फेन गिरावहिं....हरि अति चाव भाव ते पावहिं....
डगमगात उठि पुनि गिर जाँई...गैयन चाटि उठेउँ पुवि सांई....
   
नित नव लीला गोठ फिराहीं....बछरन संग करइ माहिं माहीं....
अब दौड़न लागे गोपाला...बो भयो बोलहिं सब ग्वाला...
   
सखा नंद खेलहिं नित खेला....गौ पाछे छुपि छैल छबेला...
गोपी देखि देखि हरषाहीं....बदन चूमि बलिहारी जाहीं....
   
दोहा
...
धेनु धूरि महँ खेलहिं सखा सहित गोपाल....
मंडल एक बनावहिं आपु बने भूपाल....
   
माखन चोर भयउँ नंदलाला...संग लिए ब्रजमंडल ग्वाला....
सबते मूल्यवान जो होई...ताहिं चुराइ चोरपति सोई...
   
माखन दुर्लभ बड़ संसारा...जानि मरम प्रभु करहिं प्रचारा...
ब्रजगोपी घर आइ कन्हाई....लै नवनीत भागि नित जाई...
   
गाँव गली सब धूम मचाई....माखन खावत आनहुँ भाई....
आपु खाइ संग सखा खिलाई...बानर चंचल देव बनाई...
   
बिन माखन सुर होवइ बानर...महिमा थेनु गाइ निसिबासर....
नहिं कोउ जतन भक्ति नर पायो....गोपीभाव सरुप लखायो...
   
दोहा....
सखा संग जदुबंसमनि करें धेनु गुनगान...
जे दरसन पावहिं नर तिनको अति कल्यान....
   
एक बार सब सखा बोलाई ...निज निज रुचि सब कहेउँ सुनाई...
मधुमंहल बोलेउ इक सपना...माखन तृप्ति होइ रचु रचना...
   
सीतहि त्रिजटा सपन सुनायऊ....ताको सपन सत्य होइ जायऊ....
सीता सुता धरनी की होई....तेहि कारन गौ जानेउ सोई....
   
जनक सुता लंका करि बासा....धेनु रुप तृन राखोउँ आसा....
माधब कहा जो गौ अनुकूला....ताको रहेउ कछु प्रतिकूला....
   
इनकी कृपा असुर हम मारे...सदा धेनु होवहुँ बलिहारे....
यांतिरुपिनी जहँ यह नाहीं....ते घर सपनेहूँ हरि नहिं जाहीं....
   
दोहा...
लता छाँह गौष्ठी भइ गौवर्धन के काज....
बाँकी छबि सिर सोहइ मोर पंख को ताज...
   
अति करुनामय कृष्न सुभाऊ....बत्स बाँधि देखे सकि नाऊ....
बंधन खोलि मुक्ति तेहिं दीन्हे....काल प्रभाव रहित सब कीन्हें....
   
जो इक बार बत्स बनि जाई...समय सीम सो दियो लँघाई...
सबते सुगम भयउ जग माहीं....बछड़ा बन सो काल नसाहीं....
   
फिरत कृष्न गृह सबके जावे...गो बछड़न को बंध छुड़ावे...
माखनचोर पुकारे कोई...सुनत एक टक देखहिं सोई......
   
चोर जोग सब जोगन्ह माहीं...रचेउँ कृष्न निज भक्तन आहीं....
भांड तोरि संचय केहि हेतू...धेनन चरित जग हित सुर सेतू....
   
दोहा....
लुकत छुपत के खेल में बत्सरुप रखि आइ...
इत उत खोजत ना मिले सखा ढूँढि नहिं पाइ...
   
नित नव लीला करहिं मुरारी...नंगभवन आनि सखि सारी....
चोर भयो कान्हा तेरो जायो...प्रीत भावमय गारि सुनायो...
   
घर भीतर प्रतिबंधित कीन्हा...कठिन दंड जननी हरि दीन्हा...
बलगाऊ कीन्हेऊँ रखवारी...निकसे नहि बाहर बनवारी....
   
लागि करन मात गृहकाजा...माटी खान लगे ब्रजराजा....
संकर्षन जसुमति पहिं आयऊ...नटबर की सब बात बतायऊ...
   
छड़ी हस्त लीन्हि नंदरानी...श्रवण खींचि माटी किमि खानी....
कह गोबिंद नहिं माटी खाऊँ....रसना गोरज स्वाद चखाऊँ....
   
दोहा....
सुनहुँ मात वह धूरि है जहँ गौ खुर नहिं जाहिं....
धूरि धुर्तता धोवइ यहि समान कछु नाहिं....
   
कहेउँ मात मुख खोरि दिखावा....सकल भुवन ब्रह्मांड बतावा....
स्याम सुरभी पय करि जे पाना...रहसि खोलि प्रभुहि सब जाना....
   
कोउ अस मरम नाही जग माही...गोरज परसि जानि नहिं पाहीं...
परम बिराट रुप दिखलावा....यह जग रीति पितहि बतावा....
   
देखि रुप अति बिस्मयकारी....गदगद गिरा नयन बह बारी....
इतनी समुझ नहिं प्रभु मोही...जानि सकहु जो निजमति तोही....
   
बार बार धरनी धरि सीसा...कछु अस्तुति नहिं जानँउ ईसा....
दसा मातु देखी मुसुकाई...भूलि गई पुवि गोद उठाई....
   
दोहा....
गोरज महिमा हेतु प्रभु कबहुँ छोट बड़ होइ....
सकल भुवन के ईस जो ब्रजरज खावें सोइ....
   
सुनहु संभु गोकुल की लीला
   कहेउँ मात मुख खोरि दिखावा....सकल भुवन ब्रह्मांड बतावा....
स्याम सुरभी पय करि जे पाना...रहसि खोलि प्रभुहि सब जाना....
   
कोउ अस मरम नाही जग माही...गोरज परसि जानि नहिं पाहीं...
परम बिराट रुप दिखलावा....यह जग रीति पितहि बतावा....
   
देखि रुप अति बिस्मयकारी....गदगद गिरा नयन बह बारी....
इतनी समुझ नहिं प्रभु मोही...जानि सकहु जो निजमति तोही....
   
बार बार धरनी धरि सीसा...कछु अस्तुति नहिं जानँउ ईसा....
दसा मातु देखी मुसुकाई...भूलि गई पुवि गोद उठाई....
   
दोहा....
गोरज महिमा हेतु प्रभु कबहुँ छोट बड़ होइ....
सकल भुवन के ईस जो ब्रजरज खावें सोइ....
   
सुनहु संभु गोकुल की लीला...कामधेनु बोली अती सीला....
करेउँ बिचार एक दिन माता....चोर भयउ का कारन ताता....
   
ब्रह्म मुहुरत उठि करि अस्नानू...सुद्ध वस्त्र पहिरेउँ परिधानू़..
गोमय धूप भवन करि लेही...गोघृत दीप जले जय देही...
   
दधि मंथन कीन्हेउँ आरंभा...खींचत नेति बाँधि लइ खंभा...
लालन सुमिरि भयउँ अनुरागा...गावति गीत सराहति भागा...
   
इक बिनती सुन गोबिंद मोरी...जनम जनम रहे प्रीती तोरी..
निकसे प्रान जबहि यहि तनसे...सुमिरन तोर टरै हि मनसे...
   
दोहा....
दास्यभाव सुमिरन भलो होत अहं को नास...
हरि पाछे पाछे फिरयो ताको प्रिय निज दास....
   
गोद धरे पय पान कराई...उबलत दूध अगिनि गिर जाई....
सुतहि निवारी दौरि जसोदा....रुठेऊँ नाथ उतारहि गोदा...
   
दधि माखन पय भरि भंडारु...दीन्हि डारी धरनी पर सारु...
लाठी पकरि जसुमति आई... देखि मातु भय बड़ हरि पाई....
   
हरि पाछे जननी तब धाई...हार गइ प्रभु सन्मुख आई...
भइ प्रसन्न पकरि लै आवा....कटि बाँधहि बाँधि नहिं पावा....
   
अंगुल दोउ रहि रज्जू छोटी...दूसरि जोरि जोरि थकि लोटी....
ब॒ड़ बिस्मय देखी महतारी....बाँध्यो गौ सोइ बँध्यो बिहारी....
   
दोहा....
जब जननी हर्षित भइ, हैं प्रभु बड़े उदार....
प्रेम भरा बंधन मिला बँध गएँ नंदकुमार....
   
जीवहु सदा न्युनता दोऊ ...मैं अरु मोर व्यर्थ करि मोहू...
इनके बँधे जीव जग जोऊ...तिनके बँधे बँधत नहिं सोउ...
   
पुनि रत मात जसोदा काजू...सब बंधन खोलत बँधि आजू....
आँगन पादप अर्जून भारी...तिनके बीच चलेउँ बनवारी....
   
ओखल अटकि खींचि कन्हाई...जुगल बृच्छ धरनी पे गिराई....
तरु तन सापित करें प्रतीच्छा...नलकूबर मनिग्रीबहिं सिच्छा....
   
सुत कुबेर करि मदिरा पाना...नारद को कीन्हे अपमाना...
तेहि कारण तन तरु को जाई...मिलत कृष्न मुकुति सो पाई...
   
दोहा.....
बार बार दंडवत करे लगे करन गुनगान....
हमहिं प्रभु नित दीजिए मिटे वृथा अभिमान...
   
नारि रुप करुना को होई...रहे सील सिला बनि सोई....
पद मद नर धरि पादप जाई...सेवही धेनु जड़ताइ नसाई...
   
दोमोदर हरि नाम धरायो....गोकुल ते बृंदावन आयो....
करत मात सन हट दिनराती...कब जैहों बन फिरत सुहाती...
   
नहिं मानत बन नटखट आयो...बच्छपाल गोविंद कहायो...
बत्सासुर निज सनमुथ देखी...पटकि मही मुक्ति तेहि लेखी...
   
गोबत्सन कर भाग जो खायो...सोइ बत्सासुर नाम धरायो...
दोउ थन लियो दोउ बत्स पिलायो...यह जग रीत सुजात निभायो....
   
दोहा....करि प्रयोग जो जंत्र का काढ़े गैयन दूध....
बत्सासुर तेहि जानिए अस अधम अबूध...
   
प्रथम धेनु कीन्हे पय पाना...पाछे घालि कसाईखाना....
तिनसो बड़ो बत्सासुर नाहीं....पुनि पनुि फिरै नरक पछिताहीं....
   
आयो असुर वहाँ तब दूजो....नाम बकासुर कंसहि सूझो....
चोंच पकरि कान्हा दिये फारी...दंभिन्ह को प्रभु दीन्हि उघारी...
   
अजगर असुर धरे अघ रुपा....समुझि ग्वाल तहँ गुऱा अनूपा....
खेलत ही प्रबिसेउँ मुख माही....माधब रोकि रुकत कोउँ नाहीं...
   
ग्वाल बाल संग गयउँ गोपाला... हाहाकार मचेउ तेहि काला...
कह गोपाल ब्रह्म सुमिरन करहू...तब तन बढ़े स्वास अवरुधहूं....
   
दोहा....
छटपटात ब्रह्मरंध्र ते निकसे तन सों परान....
ग्वाल बाल रच्छित भये गौ की कृपा महान....
   
पाप बिगारी ताहि कछु नाहीं...गौ की सरन जीव जब जाहीं....
देखि देखि ब्रह्मा हरिलीला...समुझ परयो नहिं संसय सीला....
   
ग्वाल बाल सब बत्स चुरायो....गुफा एक बिधि आन छुपायो...
सखा बत्स राखे प्रभु रुपा ....बृंदावन हरि साखि अनूपा....
   
निज करनी कर बिधि पछितायो...दौरि दौरि बृंदावन आयो...
भूल भइ अनुचित मैं कीन्हो...छमहुँ नाथ अभय बर दीन्हो....
   
गौ अरु गौसेवक जग माहीं ....भीव बसीय नहिं बुद्धि समाहीं....
गैयन संग दरस प्रभु होवे...नैनवंत सुभ लगन खोवे....
   
दोहा....
धेनु सरलता रुप हैं जामे हरिहि निहार....
जाकी सेव मे फिरै नारायन अवतार...
   
पाँच बरष के प्रभु बत्सपाला.... षष्ठ बरस हरि बन्यो गोपाला....
कार्तिक सुक्ल पच्छ अति पावन...गोपाष्टमी सकल मन भावन
   
परव अपूर्व गोप संग लीन्हे...राम स्याम गमन बन कीन्हे....
कबहुँ उछलि कहुँ दौर लगावें....ना ना खेल सखन्ह खेलावे....
   
लता ओट कबहुँ छुपि जाई...खोजड़ि ग्वाल पुकारि कन्हाई....
प्रथम दिवस गो चारन आयो....दीजो भोज हमहि सबायो...
   
नहिं खावें दधि माखन रोटी...फलाहार मति सुधरे खोटी....
चलहि लेन फल संग बलदाऊ...धेनुक असुर बाग भलपाऊ....
   
दोहा....
गदर्भ रुप रहेउ तहाँ फल नहिं खावे कोउ....
आपु खाइ नहिं अरहु दुष्ट रुप यह होउ...
   
धेनुक असुर जो गौ हत्यारा...नासहिं संजम नियम अचारा....
जप तप धर्म जग्य अरु दाना...ताको फल नहिं मिले प्रमाना....
   
धरम करम नित नव जरि जाहीं....होइ बिफल सब पुन्य नसाहीं....
इन्हहिं खोजि पकरउ अरु मारउ ....धरनी को बहु भार उतारऊ....
   
सकल जगत दुख कारन कोही....मातु मारि धिग धिग जग द्रोही....
गौ कन्या दोनउ अक रुपा....इन्ह सम नहिं कोउ जगत अनूपा...
   
जे जन इन्हहिं सतावहिं पापी...रौरब नरक पाइ संतापी....
जड़ धरती चेतन गौ रुपा....निज दुख सहहिं संत अनुरुपा....
   
दोहा....
धरती पर सब तीरथ धरनी बड़ी महान....
धरा धेनु इक जानिए मानहि भेद अजान.....
   
नभ वायु पावक जल धरनी सब्द परस रुप रस करनी....
गंध मनोरम अबिरल निकसे....पाइ संत मन पंकज बिकसे....
   
गुग्गुल गंध बहइ बहुतेरी...जगत अधार असुभ निवेरी...
भूत भविष्य गैयन ते होवे.... तुष्टि पुष्टि संतुष्टि संजोवे...
   
लच्छि मूल इनको जो देवा....सो अनंत गुन पावहिं सेवा...
दरस परस अरु नमन करावा....परिक्रमा रज तिलक धरावा....
   सप्त द्वीप भूमंडल सारु....सोइ फल मिलइ सकल भंडारु....
निज बपु रमा जेहि बासू....सुरभी कुल शुद्ध सरल सुबासू....
   
जनम जनम अघ नासहिं तबहीं....ब्याती गाइ प्रदखिन जबहीं....
निमोनिया ज्वर ताप मिटावें....बछिया को गौमुत्र पिलावें....
   
दोहा....
ब्रह्म सुता अवतरत ही सब बिधि पावन होइ...
नमो नमो जगदीस्वरि तोहि सम औरु कोइ....
   
सृंग अग्र तीरथ बसि सारे...सकल देव नित आनि पधारे....
सर्बदेवमय बनि तदरुपा....करहि प्रदिच्छन जेहि नरभूपा....
   
रोम समूह कोटि तैंतीसा....धरा उदर गिरि बन सह ईसा....
मानुष बन्धु मित्र मानब की....जे घर नहिं ते तिथि दानव की....
   
सब ते दुर्लभ जग गौ दाना....गौ महिमा को करहि बखाना....
बल पौरुष इत होइ परिच्छा,..सोइ कुल तारक जे गौ रच्छा....
   
पावन मही धेनु के स्वासा...परसि होइ मंगल अघ नासा...
करहिं तृप्त गौ भजन लीन्हो....बिंजन सकल सुपाचन कीन्हो....
   
दोहा...
धेनु तृप्त कीन्हे बिना अति सुपाच्य दधिभात....
कंद मूल फल साग भी नाहिं पचे करि घात....
   
गौ को देन लगे जब चारा...गल घंटी तब करइ जैकारा....
जहँ कंठी घंटी नित बाजे...सकल आपदा तुरतहि भाजे....
   
जे घर बसइ गाइ अनिवारु...कन्या गाय दान ब्यवहारु....
गौ की पीर देखि गोपाला...बने गाइ मारेउ कलिकाला...
   
कोउ अघ कोटि करै पछिताई....ठाड़े भए अग्र करि गाई...
तिनके अघ नहिं देखि गोपाला....छमा दान करि बदरी बिसाला....
   
तीरथ सोइ जहँ करि जलपाना...गंगा आदि रुप तेहि जाना...
उठे प्रात गौघृत मुख देखी....मिटत पाप दुख दारिद लेखी....
   
सुर मंदिर गौ ईस बनावा....प्रेम बिनय धरि दरसन पावा....
दोत तुरत बर गोबर डारी...पूजा सफल होत नर नारी...
   दोहा...
देव बिप्र अरु साधू हित धार्यो मनुज सरीर...
धेनु हेतु करुनामय सहत रहे नित पीर...
   
दरस सुरभि नित मंगल सेई...द्विज कन्या नर मोदक लेई...
गाइ माइ सब भाय सुहाई...देइ दूध मन भावत पाई....
   
बत्स पूँछ पकरे जदुराई....भयबस इत उत चले पराई....
ग्वाल देखि आनंद उछाहू...जमुना भगति सुभाउ प्रबाहु...
   
मोहि दरसन गैयन नित होऊ...कृपा दृष्ट् देखहिं प्रभु सोऊ....
धेनु हमारी मात हम तेरे...रहहु तहाँ जहँ जन बस तेरे...
   
जग कारन तेरे हम रहहीं ....बेद पुरान संत सब कहहीं....
सरग होतु गावहिं सोपानू....सेवहिं जे ते नित कल्यानू...
   
दोहा....
सत्यकाम जाबाल को गौमाता गौ को गान...
गौसेवा से पावहिं मुक्त संग ब्रह्मग्यान...
   
गोमय लेपन ते मिटि कुंठा... रमा बसेउँ बनेउँ बैकुंठा....
रघुकुल राम लीन्ह अवतारा...सेवहिं धेनु मिलत फल सारा...
   
सूरजबंस इक भयउँ नरेसू...नाम दिलीप अवध तेहिं देसू...
संतति रहित गयउँ गुर पाहीं...कारन काह मोर सुत नाहीं....
   
करि बिचार बोले सुन ताता...मिली राह तोको गौ माता...
नरिं प्रनाम आदर नहुं कीन्हा...बाम भाग छाड़ि तेहि दीन्हा...
   
तेहि कारन नहिं तनय तुम्हारे...सेवहु नंदिनी बचन हमारे...
गुर के बचन रखे हियँ माँहीं....चले धेनु संग जिमि प्रतिछाँहीं....
   
दोहा...
चलने पर भूपति चले बैठन पर बिश्राम...
संग चलत सुदच्छिना भूल गए निजधाम...
   
कर सुपात्र नित रहत सुदच्छिना....प्रतिदिन करहिं पूजि प्रदच्छिना....
पुत्र काम लगि करि नित पूजा... सरनागत भइ भाव दूजा....
   
इक दिन गिरि गह्वर महँ जाई....माया रचित सिंह तहँ आई...
झपटि नंदिनी नृप सह रोषा...कहा सिंह मोहि नहिं कछु दोषा....
   
मोर अहार मिलेउ मोहि आजू...तू किमि बीच परेउ सुन राजू...
मेरो कछु सकत तु बिगारी...ब्यर्थ परिश्रम चाल तुम्हारी...
   
आतुर भाव गिरा नृप आजू...बिनती सुनहु मोरि बनराजू...
मोरी बलि लीजो यहि छाँड़ो...नतरु आज बनि मैं अघ भाँडो....
   
दोहा....
काहे को मूरख बने ऐसी गाय अनेक...
आनि देहिं गुरु तोषहिं देख बिचार बिबेक...
   
नृप तब कहा सुनहुँ मृगराजू...छत्री नित रच्छक महि काजू...
निंदा मलिन प्रान अरु राजू...तजहि बमन सम नस्वर साजू....
   
तब गुर भगति दया को भाऊ...मै प्रसन्न माँगउ वर राऊ....
केवल दूध दीन्हि नहिं गाई....कामधेनु मोहि समझउँ भाई....
   
परेउँ पाद तनु रज लिपटाई...सकल मनोरथ पूरन पाई...
एक बरष भीतर सुत होऊ...जगत प्रसिद्ध नाम रघु सोऊ...
   
परेउँ पाद तनु रज लिपटाई...सकल मनोरथ पूरन पाई...
एक बरष भीतर सुत होऊ...जगत प्रसिद्ध नाम रघु सोऊ...
   
तासो बंस भयउ बिख्याता...गौसेवा कर फल यह ताता...
एक बार रघु जग्य कराहीं....सरबस दान दिए द्विज पाहीं...
   बहु बिधि मुनिहिं भूप सत्कारे....माटभांड पद कमल पखारे...
समुझेउँ कैत्स कछु नहिं बोले...अब का करउ मनहिं मन डोले...
   
दच्छिना सुत बोले कर जोरी...मुनिबर आयसु दीजो थोरी...
कहा कौत्स का कहउँ नरेसू....गुरदच्छिना काज फिरउँ देसू....
   
कहि नृप निसा करहुँ बिश्रामू....प्रातकाल आवइ अभिरामू....
नृप निज सेन दीन्ह आदेसू....चढ़ कुबेर पहुँ पाइ सँदेसू.....
   
रातहि रात भरहि नृप कोषू....हरषि दीन्ह निज सत्य भरोसू....
भयो बिबाद मोहि सोइ दीजो....कह रघुराज सबहुं प्रभु लीजो...
   
दोहा....
रीति नीति धन भारती त्याग हेतु जहँ बाद....
लड़त चाह महाभारत रामायन तजि पाद...
   
राजभवन गौ सदन समीपू...रिधि सिधि बसि गोमय द्वीपू...
उत्तम बृषभ मूत्र जेहि सूँघा...बाँझ गर्भ धारे कहे गूँगा...
   
गौघृत लेपन करहि पुराना...उतरे ज्वर तनु स्वस्थ सुखाना....
सब प्रकार गौ रच्छा कीन्ही ...तिनके नाम गोत्र रखि लीन्ही....
   
गोरज संतत पावन भारी...ब्रह्म सकल निज अंगन्ह डारी....
तीर्थ गवन भोजन द्विज दीन्हे...ब्रत उपबास तपस्या कीन्हे...
   
सकल दान हरि सेवन कीन्हा....धरा भ्रमन सर्बदा सत लीन्हा...
ग्यान ध्यान से पुण्य जो आवें....गो तृन दिए सकल नर पावें....
   
दोहा....
जो गैयन को मारते ताको तच्छन मार....
छमा नहिं तेहि दीजिए उतरी धरा को भार...
   
गौ की पूँछ पकरि के झारे....भागे रोग एक पखवारे...
बिनु गौमूत्र आइ नहिं सुचिता...गोमय बिना पाइ नहिं मुदिता....
   
धरमराज यह सब्द पुरातन...सत्ता सदगुन संग सनातन...
जेहि जेहि देस धरम को राजू....सबल स्वस्थ गोबंस समाजू....
   
एकबार ग्यानी मिथिलेसू....गाइ निवारी चरहिं जेहि देसू....
तेहि अघ नरक दरस सो होये...करहु बिचार धेनु जब रोवे...
   
निगम धेनु द्विज नित सतबादी...सती निर्लोभ दान महि आदी....
सुघर कल्पतरु छाया पावे...गौ तब कामधेनु बन जावे....
   
निरपराधिनी गौ निरदोषा....पीर जोग नहिं का रोषा....
पावन गौ मंगल की दाता....स्वरग सोपान सनातन माता....
   
दोहा....
गौ तीरथ पावन करे सरिता सुरसरि आदि....
जे रज पुष्टि निवासिनी इतर धेनु बिन बादी...
   
सदा सदा गौमाता सेब्या....अखिल ब्रह्मांड नायिका देब्या....
निर्भय होत स्वास जहँ लेई....भागे अघ सोभा भरि देई...
   
नाम सहस्त्र अंब के जोई...तिन्ह महँ नाम गाय को होई....
नमो नमो जोगेस्वरि मैया....कारिनी भरनी जयंती गैया....
   
प्रकृति गम् गतिसील प्रभाऊ...सुचिता दुहिता दया सुभाऊ....
नमो देवि सुरभि महादेवी...बीदरुपिनी तूँ हरि सेवी....
   
राधारमण कृष्ण की पूज्या...ब्रह्मा बेद संभु की सेब्या...
माधब मात गौ मात नमामी...कल्पबृच्छ सुख संपदा नामी...
   
दोहा...
धनदा बलदा सत्रुहा सुभदा भद्रा मात....धर्मदा धात्री कीर्तिदा जसदा नाउँ थात...
   
गोखुर नाग करे नित बासू....गरल पिए खैंचत निज स्वासू...
बैल जुते करिहहिं जब खेती...मिटे छुधा तृप्ति सोइ देती...
   
खर पतवार गौमुत्र बिनासे....कीट बिषैल उपज नहिं बासे,....
गो हित हेतु प्रानु जो देही...तजे देह सुरपुर ते गेही....
   
सुरभी सर्बहिता पुण्यरासी...तिहुँ पुर पावन रहे गोग्रासी...
नरक भयंकर असिप्रतादी...पाइ पार बैतरनी नांदी....
   
नमो नमो गौमात नमस्ते...कृपा मात भव सिंधू तटस्ते....
लौह पात्र गौमुत्र तपायो...बाटी बन मधुमेह मिटायो...
   
दोहा....
भव ब्याधी बंधन मिटे कटे रोग सब पीर...
सुरभी सुरपुर बसिहइ सेवे रिषि मुनि धीर....
   
गुरु  गोविंद सिंह सजि गरजे...गौ को घात देस महँ बरजे....
मानव सब्द नइ माँ मिलई....मिले मातु गौ मानब बनई...
   
रिषि मुनि नाम मात यहि दीन्हो.....नव जीवन दाती तेहि चीन्हो...
सब देवन्ह जिन्ह देह बिठायो....सर्ब देवमइ गौ कलायो...
   
सूरज किरन आयु गौ जोती....बसत गाय गौ संग्या गोती...
गौ की पूँछ पकरि जब कोई...दिनकर लोक जुरत तब सोई...
   
भाव बजे आस्तिक जिन्ह माहीं...अंतकाल गौपुच्छहिं चाहीं....
भारत भरत नाम से होई....जहँ नित भरे रहत सब कोई....
   
दोहा....
गुर कहे जो जगत के त्याग समर्पन पेम....
कौपीनवंत मुखचंद के संयम तपधन नेम....
   
सिवके अंक उमा गौरुपा...सर्बदेव गौ अंक अनूपा....
गोपनीय यह मरम अनंता ....गुहय देस जहाँ रमा बसंता....
   
अरध  पाव पानी को लीन्हो...तोला चार गौंत संग कीन्हों....
किंचित मधु नीबू तहँ डारो...ब्यर्थ मेद नित पिवत निवारो....
   
गौतनु नित जो हाथ फिरावे...दिब्य दृष्टि मिलि दोष मिटावे...
रोग असाध्य मिटे  नित नेमा...बसन भिगाइ घाव धोइ पेमा....
   
कान्हा स्याम रुप रखि आयो....स्यामा धेनु मनहिं अति भायो....
इच्छा रुप बपु निज लीन्हो...काली गौ आदर अति कीन्हो...
   
दोहा....
बिमल धेनु तन बैठक रचना रचें बिधात...
अंग अमग पावन किए सकल पगारथ मात....
   
मल भी मलसोधक जिन्ह केरे...धन्य जनम जे इन संग फेरे...
लख चौरासी उदर समाहीं...उत्तम बस्तु अधम होइ जाहीं....
   
सेंधा लबन मूत्र मिलि ताता...उदर बिकार दूर होइ जाता...
अंजुलि भरि पुनि करिसों आधा...तुरत मिटत तेहि मल की बाधा...
   
हरि प्रतिनिधि धेनु पहचानू...मानब परान जानि सनमानू....
बारिधि मथे धेनु रिषि पाए....रिषि प्रसाद सब ग्रंथ सुनाए....
   
बड़ असीस गाय को मानो.... नहिं जहँ धेनु असुर सोइ जानो..
कृपादृष्टि तापर नित होई....धेनु धूरि धूसर तन जोई...
   
तब लगि पूँठ पकरइ जब लगि रही अबोध...
बोध होत गौ पूँछ को पकरत भयो प्रबोध....