Wednesday, 29 April 2015

दिव्य धेनुमानस

चौपाई - बसहिं सुरभि जहाँ तीरथ सोई। तजहिं प्रान मुक्ति सब कोई।। रोम - रोम सुर तीरथ चरना। केहि बिधि मातु करउँ मैं बरना।।  अर्थ - जहाँ सुरभि गौ माता बसती है वहीं तीरथ होता है। जो गौ के सन्मुख प्राण छोड़ता है, वह हर व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त करता है।(अन्तिम समय में जो राम नाम लेने का जो फल है वही गौ माता के स्पर्श का है। स्वयं विचार करे कि दोनों कार्य में कौन सा सरल है निश्चित ही गौ स्पर्श सरल है) जिस गौ माता के रोम - रोम में देवता हैं और पैरों में तीरथ है ( तीर्थ तो मेरे पैर के नीचे है) किस प्रकार माता मैं आपकी महिमा का वर्णन करूँ।                                              धेनु मानस

Friday, 24 April 2015

धेनुमानस ग्रन्थ की चोपाईयां

तब बङा कठोर शब्द हुआ, सारे गोप एवं गोपियाँ दौड़ती आयी, जिस किसी प्रकार से कृष्ण को लिया और सोचने लगी कि नारायण ने आज सहायता की।                                       धेनु मानस

Thursday, 23 April 2015

Dhenumanas धेनुमानस ग्रन्थ

गौ माता जगत के हित के लिए प्रगट हुई है, इसको परम हितैषी जानो। इस माँ की पूजा में लग जा, मोह, मद, अभिमान त्याग दे।      

Tuesday, 21 April 2015

Dhenumanas धेनुमानस

छन्द - धन धन गोपाला हे नंदलाला गौ कारण जग आयो। सुन हे बनवारी बिनय हमारी गौ को नहिं बिसरायो। धरिके नररूपा हे सुरभूपा गौ चारन बनमाली। जेहि सृष्टि बनाई वही गौ माई दीन्हि सीख गौपाली। का करूँ प्रसंसा मानस हंसा गोकुल तारन आयो। तू अबिकारी जनमनहारी धनि धनि जो हियँ लायो। नंद जसोदा दीन्हि बिनोदा तप केवल गौ सेवा। यह दास तुम्हारो आन पधारो सरन गोपाल को लेवा।  अर्थ - हे गोपाल अब सुन लो, हे नन्दलाला आप गौ के लिए आए हो। हमारी यह विनती है। हे बनवारी सुनो गौ को मत भूलो। हे देवताओं के राज़ा आपने नर रूप धारण किया। हे वनमाली गौ चराने आये हो। जिसने सृष्टि बनाई वही गौ माता है। गौ सेवा की सीख दी है। हे प्रभु क्या प्रसंशा करूँ आप मन सरोवर के हंस आप गोकुल को तारने आए हो। आप अबिकारी हैं। अपने जनो के मन को हरण करने वाले हो, वे लोग धन्य है जिन्होंने आपको अपने हृदय में बिठाया है। नन्द और यशोदा को आपने विनोद दिया, उनकी तपस्या गौ सेवा है। हे प्रभु, आपका यह दास है आकर कृपा करो गोपाल को शरण ले लो।                    धेनु मानस